Tuesday, October 13, 2009

अनिल अंबानी के विदेशी रुतबे से मामले ठंडे बस्ते में

विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली से नईदुनिया से साभार
अनिल अंबानी समूह का रुतबा सिर्फ देश ही नहीं विदेश में भी है। एडीएजी समूह में रिलायंस कम्युनिकेशंस लि.(आरकॉम) को बेहद ऊँचा दर्जा प्राप्त है। सस्ती मोबाइल फोन सेवा शुरू करके दूरसंचार क्षेत्र में आम आदमी तक मोबाइल फोन पहुँचाने का कमाल करने वाली आरकॉम ने अपने पूँजी खर्च (कैपेक्स) के लिए विदेशों से जुटाए गए २००० मिलियन डॉलर की रकम से १२०० मिलियन डॉलर यानी तब के डॉलर मूल्य के मुताबिक ५१४२ करोड़ रुपए शेयर बाजार में लगाकर मुनाफा कमाने का कमाल भी किया है। कंपनी के खिलाफ भी फेमा का उल्लंघन करने और विदेशों से जुटाई गई पूँजी को शेयर बाजार में लगाने की शिकायतें हैं।

एक तरफ प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की छवि ईमानदारी की है और कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी सामाजिक सरोकार तथा स्वच्छ प्रशासन पर जोर दे रहे हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार के अधिकारियों के एक वर्ग की चाल बेढंगी है। ऐसा लगता है कि वे गंभीर मामलों को भी ठंडे बस्ते में डाले रहते हैं। जबकि संसद में सरकार खुद मान चुकी है कि एडीएजी की कुछ कंपनियों ने वित्तीय नियमों और फेमा के प्रावधानों का उल्लंघन किया है।

सांसदों के सवाल और प्रधानमंत्री को लिखे उनके पत्र भी नौकरशाही के रवैये पर कोई असर नहीं डाल पा रहे हैं। इधर विरोधी खेमे के कुछ लोगों ने माकपा महासचिव प्रकाश करात समेत वामपंथी नेताओं से भी मुलाकात की। भाजपा नेताओं से भी शिकायतें की गईं। कांग्रेस नेताओं तक भी बात पहँुचाई जा चुकी है।

हिन्दी दैनिक अखबार नईदुनिया के हाथ लगी रिलायंस कम्युनिकेशंस लि. की २००६-०७ ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक ईसीबी (एक्सटर्नल क्रेडिट बॉरोइंग) और एफसीसीबी (फॉरेन करंसी कनर्वेटिबल बांड्स) के जरिए २००० मिलियन डॉलर की पूँजी जुटाई गई। कंपनी की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक एफसीसीबी जारी करके जुटाई गई पूँजी में से कंपनी ने १३४३ करोड़ रुपए का उपयोग एफसीसीबी जारी करने वाले दस्तावेजों में घोषित उद्देश्य के लिए किया।

शेष ५१४२ करोड़ रुपए जिनका उपयोग नहीं किया गया, उस राशि को बिना ब्याज के अपनी एक उप कंपनी में जमा करा दिया गया।
दिशा-निर्देशों के विपरीत : राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने भी यही कहा है कि उसे प्रबंधन ने जानकारी दी है कि यह राशि एक बैंक डिपॉजिट के रूप में उनकी एक उप कंपनी के ही पास है। सरकार ने संसद में यह भी कहा कि इस तरह अपनी उप कंपनी के पास धन जमा करना ईसीबी के दिशा-निर्देशों के विपरीत है। इसलिए रिजर्व बैंक ने इस मामले को संबद्ध एडी बैंक के साथ नवंबर २००८ उठाते हुए उसकी टिप्पणी माँगी है। वहीं एडीएजी के दिल्ली स्थित प्रवक्ता से नईदुनिया ने जब इस मामले में उनका पक्ष पूछा तो उन्होंने इसे विरोधियों का प्रचार बताते हुए कहा कि यह पुराना मामला है और यह पहले भी मीडिया में आ चुका है।
कार्रवाई की जाए : उधर नईदुनिया में खबर छपने के बाद भाकपा नेता अतुल कुमार अंजान ने माँग की है कि फेमा और दूसरे वित्तीय कानून का उल्लंघन करने वाले पूँजीपतियों पर भी उसी मनी लांड्रिंग कानून के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए जिसके तहत झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा पर मुकदमा दर्ज किया गया है। अंजान कहते हैं कि "एक तरफ तो प्रधानमंत्री कहते हैं कि सीबीआई बड़ी मछलियों को पकड़े, दूसरी तरफ सीबीआई, ईडी, डीआरआई छोटी मछलियों पर तो कार्रवाई करती हैं लेकिन शार्क मछलियाँ खुलेआम देश को लूट रही हैं। सीबीआई और सीवीसी को उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए जो इस मामले में शामिल हैं।" वित्तीय कानूनों के खुलेआम उल्लंघन पर सरकारी एजेंसियों के ठंडे रवैये के इन मामलों को कुछ सांसदों ने संसद में उठाने का फैसला किया है।

No comments:

Post a Comment