रिलायंस कम्युनिकेशंस का मशहूर नारा था- "कर लो दुनिया मुट्ठी में।" इस कंपनी के चेयरमैन अनिल अंबानी ने दुनिया तो नहीं, देश की सरकार जरूर अपनी मुट्ठी में कर ली है। सत्ता के गलियारों में, उद्योग जगत की गगनचुंबी इमारतों में और अफसरों के केबिनों में सब कहते हैं कि केंद्र और राज्यों में किसी की भी सरकार हो, लेकिन तूती अनिलभाई की ही बोल रही है। राज्यसभा सांसद के रूप में सत्ता के गलियारों के भीतर तक जा चुके अनिलभाई का दबदबा ऐसा है कि हर सप्ताह, आमतौर पर हर बुधवार कैबिनेट सचिव, प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव और दूसरे कई महत्वपूर्ण सचिव व उच्च अधिकारी छोटे अंबानी की अगवानी अपने दफ्तरों में करते हैं। इसके लिए अनिल हर हफ्ते मुंबई आते हैं। "नईदुनिया" से प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है।
अनिल के करीबी सूत्र भी कहते हैं कि ऐसा वे पिछले कई सालों से कर रहे हैं और महत्वपूर्ण लोगों से अपने रिश्ते तरोताजा करते रहना उनकी पुरानी कार्यशैली है। सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर कौन तैनात होगा, इसमें अनिल की दिलचस्पी जगजाहिर है। सत्ता के गलियारों में केंद्र सरकार के कई सचिवों और दूसरे बड़े अधिकारियों की तैनाती और बदली में अनिल व उनके दोस्त राजनेताओं की भूमिका की चर्चा आम है। पूर्वोत्तर समेत देश के कई राज्यों में मुख्यमंत्री की कुर्सी के फैसले में भी उनके लोगों का दखल जगजाहिर रहा है।
यही वजह है कि अनिल धीरूभाई अंबानी समूह यानी एडीएजी की कई कंपनियों में अरबों रुपए की पूँजी के हस्तांतरण में लगे आरोपों की शिकायतें रिजर्व बैंक, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सेबी और दूसरे मंत्रालयों में ठंडे बस्ते में पड़ी हैं। अदालत के आदेश और संसद में सवालों का भी सरकार पर कोई असर नहीं होता।
अंबानी घराने में बँटवारे के बाद अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (एडीएजी) ने पिछले कुछ वर्षों में सफलता की कई नई ऊँचाइयाँ चढ़ी हैं। अमीरी में अनिल अपने बड़े भाई मुकेश से थोड़ा ही पीछे हैं। बिजली, टेलीकॉम, सूचना तकनीक, इन्फ्रास्ट्रक्चर समेत कई क्षेत्रों में इस समूह ने रिलायंस नामधारी अपनी कई कंपनियों को उतारा है। लेकिन इन कंपनियों के जरिए देश और विदेश में करीब ४८ हजार ४७५ करोड़ रुपए को किस तरह इधर से उधर करके मोटी कमाई की गई है, वह भी कम दिलचस्प नहीं है।
इसके लिए इन कंपनियों द्वारा सरकारी कानूनों, सेबी और रिजर्व बैंक के नियमों और वित्तीय प्रावधानों के उल्लंघन की कई शिकायतें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पास पहुँची हैं। रिजर्व बैंक ने भी कई मामलों में एतराज जताते हुए अपने निर्देश जारी किए हैं। सांसदों ने संसद और सरकार के सामने सवाल उठाए हैं। विदेशी मुद्रा विनिमय कानून (फेमा) के उल्लंघन को लेकर प्रवर्तन निदेशालय ने एक मामले में इंग्लैंड और स्विट्जरलैंड से जानकारी भी माँगी है। "नईदुनिया" ने इस आशय के जरूरी दस्तावेज भी हासिल किए हैं।
अपनी खोजबीन में "नईदुनिया" को एडीएजी समूह की कंपनियों द्वारा फेमा, सेबी, ईसीबी, आरबीआई और अन्य वित्तीय प्रावधानों व नियमों का उल्लंघन करके अरबों रुपए की रकम इधर-उधर करने के कई मामलों का पता चला है। एडीएजी समूह की कंपनी रिलायंस इन्फ्रा द्वारा ईसीबी (एक्सटर्नल क्रेडिट बारोइंग) नियमों के विपरीत नवंबर 2006 में दादरी बिजली परियोजना के लिए 16.56 अरब रुपए जुटाकर उनका भारत में शेयर बाजार में निवेश कर दिया गया।
रिजर्व बैंक की शिकायत पर यह मामला प्रवर्तन निदेशालय के पास है। आरएनआरएल द्वारा अक्टूबर 2006 में जुटाई गई 13.80 अरब रुपए की एफसीसीबी की रकम में से 12 अरब 65 करोड़ की रकम ईसीबी नियमों के विपरीत भारत में शेयर बाजार में लगाई गई। यह मामला भी प्रवर्तन निदेशालय के पास है। रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड (आरकॉम) द्वारा मार्च 2007 में 92 अरब रु. की ईसीबी व एफसीसीबी की रकम से 55.20 अरब रु. की रकम को अपनी उप कंपनी को बतौर ब्याजमुक्त कर्ज दे दिया, जिसे उस कंपनी ने शेयर बाजार में लगा दिया।
यह मामला रिजर्व बैंक के पास विचाराधीन है। 2006-07 में आरएनआरएल द्वारा 13.80 अरब रु. की एफसीसीबी व रिलायंस इन्फ्रा ने 23.46 अरब रु. की ईसीबी को लंदन में जमा करके ओवरड्राफ्ट लेने, उस रकम को कुछ हीरा व्यापारियों के खातों में स्थानांतरित करके उसे मॉरीशस के रास्ते भारतीय शेयर बाजार में लगाने के आरोपों की जाँच भी प्रवर्तन निदेशालय के पास विचाराधीन है।
हर बुधवार दिल्ली दरबार में : एडीएजी कंपनी समूह के अध्यक्ष अनिल अंबानी हर सप्ताह आमतौर पर बुधवार को दिल्ली आकर कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर और प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के प्रमुख सचिव टीके नायर समेत कई सचिवों और अन्य महत्वपूर्ण अधिकारियों से मुलाकात करते हैं। इसकी पुष्टि "नईदुनिया" से सरकारी सूत्रों ने की है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि बड़े उद्योगपतियों की इन मुलाकातों में कोई अनहोनी बात नहीं है। सरकार के साथ राय-मशविरे के लिए ऐसी मुलाकातें होती रहती हैं। यह पूछने पर कि क्या दूसरे उद्योगपति भी इसी तरह वरिष्ठ अधिकारियों से नियमित मिलते हैं और क्या उनके लिए भी कैबिनेट सचिव और प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव के पास समय है, तो सरकारी सूत्रों ने कहा कि समय लेकर कोई भी उनसे मिल सकता है।
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