- विनोद अग्निहोत्री
अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (एडीएजी) को अपनी विदेशी उप कंपनियों के जरिए विदेशी पूँजी जुटाकर और फिर उसे दूसरी उप कंपनियों में लगाने और उन उप कंपनियों के शेयर ढाँचे में बदलाव करके खासी कमाई करने में महारत हासिल है।खोजबीन में कुछ ऐसे मामले मिले, जिनमें बड़ी सफाई से विदेशी पूँजी का अपनी उप कंपनियों में एक के बाद एक करके निवेश किया गया। कागजों पर उन उप कंपनियों के नियंत्रण तंत्र को बदला गया और फिर उन्हें अपनी दूसरी कंपनियों के दायरे में लाकर अपनी रकम को दोगुना-चौगुना किया गया।
इसे लेकर एडीएजी पर फेमा और दूसरे वित्तीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कई सांसदों ने प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को पत्र लिखकर रिजर्व बैंक और प्रवर्तन निदेशालय से जाँच कराने की माँग की है। प्राप्त दस्तावेजों के मुताबिक रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) की एक उप कंपनी गेटवे नेट ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड सिंगापुर ने 2007 में स्टैंडर्ड चार्टर्ड और बर्कलेस बैंक सिंगापुर से 1500 मिलियन डॉलर की पूँजी उठाई। इस पूँजी को बर्कलेस और जेपी मार्गन चेज में निवेश किया गया।आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि इससे रिलायंस पॉवर लिमिटेड के आईपीओ लाने से पहले शेयर बाजार ऊपर उठ गया। इस निवेश के जरिए एडीएजी समूह ने भारत में अपनी अन्य कंपनियों के शेयरों में निवेश करने वाली वित्तीय संस्थाओं के लिए कोलेट्रल सिक्योरिटी देने की पेशकश की।इससे शेयर बाजार ऊपर उठ गया और रिलायंस पॉवर के आईपीओ में निवेश में खासी वृद्धि हुई।
31 मार्च 2008 को आरकॉम ने गेटवे नेट ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड को अपने नियंत्रण से बाहर करते हुए एक अमेरिकी डॉलर के मूल्य पर अपने दस लाख इक्विटी शेयरों ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड की कंपनी यारमोथ इंटरप्राइजेज लिमिटेड को जारी कर करीब 91 प्रतिशत अपने मालिकाना हित छोड़ दिए।जुलाई 2008 में यारमोथ इंटरप्राइजेज लिमिटेड ने ये शेयर जर्सी चैनल आइलैंड स्थित कंपनी समरहिल लिमिटेड को बेच दिए। एक अक्टूबर 2008 को समरहिल लिमिटेड ने यह शेयर रिलायंस ग्लोबलकॉम बीवी नीदरलैंड्स को बेच दिए, जो कि आरकॉम की शत प्रतिशत उप कंपनी है।
वित्तीय नियमों का उल्लंघन करके विदेशी पूँजी का अपनी उप कंपनियों में निवेश के जरिए शेयर बाजार को प्रभावित करने के एक और मामले का पता लगा।अक्टूबर 2007 में आरकॉम ने 1000 मिलियन डॉलर की रकम का निवेश रिलायंस इन्फोकॉम बीवी, जिसका नया नाम रिलायंस ग्लोबलकॉम बीवी (आरजीबीवी) है, के प्रिफ्रेंशियल शेयरों में किया।
आरजीबीवी ने इस रकम में से 500 मिलियन डॉलर का निवेश अपनी एक उप कंपनी फ्लैग पैसिफिक होल्डिंग्स लिमिटेड बरमूडा के पाँच लाख प्रिफ्रेंशियल शेयरों में किया।एक नवंबर 2007 को फ्लैग पैसिफिक होल्डिंग्स ने 500 मिलियन डॉलर फ्लैग प्रोजेक्टस प्राइवेट लिमिटेड (फ्लैग प्रोजेक्ट्स) सिंगापुर को नेक्स्ट जनरेशन नेटवर्क (एनजीएन) की परियोजना के लिए अग्रिम पूँजी के रूप में हस्तांतरित कर दिए।इस मामले की शिकायत करने वाले सांसदों का आरोप है कि इतनी बड़ी रकम के निवेश के लिए इस कंपनी को इसलिए चुना गया जिससे कि सरकारी एजेंसियों और शेयरधारकों को भ्रमित किया जा सके कि यह निवेश आरकॉम की उप कंपनी फ्लैग में किया गया है।
जबकि वास्तविकता यह है कि फ्लैग प्रोजेक्टस प्राइवेट लिमिटेड सिंगापुर निवासी एक भारतीय मूल के व्यक्ति की है। इसके पहले के और मौजूदा निदेशक वे लोग हैं, जो एडीएजी के साथ जुड़े रहे हैं। 500 डॉलर की इस रकम को आरकॉम के समग्र खातों में "कैपिटल वर्क्स इन प्रोग्रेस" के एडवांस के रूप में दिखाया गया है। आरोप है कि ऐसा विदेश में किसी दूसरी कंपनी में इतने बड़े निवेश को शेयरधारकों से छिपाने के लिए किया गया।इस कंपनी ने एसीआरए सिंगापुर में अपने खाते नहीं जमा किए, जिससे इस रकम का आगे क्या हुआ इसका भी पता नहीं चलता है। लेकिन अनिल अंबानी समूह का सरकार और राजनीतिक गलियारों में दबदबा इस कदर है कि कांग्रेस और भाजपा के कई नेता इस मामले पर प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं।
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